…चाँद पे परियां रहती थी

मुझको यकीं है सच कहती थी जो भी अम्मी कहती थी !
जब मेरे बचपन के दिन थे, चाँद पे परियां रहती थी !

एक ये दिन जब अपनो ने भी हमसे नाताँ तोड़ दिया !
एक वो दिन जब पेड़ की शाखें बोझ हमारा सहती थी !

एक ये दिन जब सारीं सड़कें रूठी रूठी लगती है !
एक वो दिन जब आओ खेले सारीं गलियां कहती थी !

एक ये दिन जब जागी रातें दिवारों को तकती है !
एक वो दिन जब शामों को भी पलकें बोझल थी !

एक ये दिन जब ज़ेहन में सारीं अय्यारी की बातें है !
एक वो दिन जब दिल में सारीं भोली-भाली बातें थी !

एक ये दिन जब लाखों ग़म और काल पड़ा है आसूं का !
एक वो दिन जब एक जरासी बात पे नदिया बहती थी !

एक ये घर जिस घर में मेरा साजो-सामाँ रहता है !
एक वो घर जिस घर में मेरी बूढी नानी रहती थी !

-javed akhtar

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