चांद से फूल से या मेरी ज़ुबाँ से सुनिए

चांद से फूल से या मेरी ज़ुबाँ से सुनिए
हर जगह आपका क़िस्सा हैं जहाँ से सुनिए

सबको आता नहीं दुनिया को सजाकर जीना
ज़िन्दगी क्या है मुहब्बत की ज़बां से सुनिए

क्या ज़रूरी है कि हर पर्दा उठाया जाए
मेरे हालात भी अपने ही मकाँ से सुनिए

मेरी आवाज़ ही पर्दा है मेरे चेहरे का
मैं हूँ ख़ामोश जहाँ , मुझको वहाँ से सुनिए

कौन पढ़ सकता हैं पानी पे लिखी तहरीरें
किसने क्या लिक्ख़ा हैं ये आब-ए-रवाँ से सुनिए

चांद में कैसे हुई क़ैद किसी घर की ख़ुशी
ये कहानी किसी मस्ज़िद की अज़ाँ से सुनिए

 

-nida fazli

 

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर के हम है

अपनी मर्ज़ी से कहाँ अपने सफर के हम है
रुख़ हवाओं का जिधर का है उधर के हम हैं

पहले हर चीज़ थी अपनी मगर अब लगता है
अपने ही घर में किसी दूसरे घर के हम हैं

वक़्त के साथ है मिट्टी का सफर सदियों से
किसको मालूम कहाँ के है किधर के हम हैं

चलते रहते हैं कि चलना है मुसाफिर का नसीब
सोचते रहते हैं किस राहगुजर के हम हैं

-nida fazli

आदमी

हर तरफ हर जगह बेशुमार आदमी
फिर भी तनहाइयों का शिकार आदमी

सुबह से शाम तक बोझ ढोता हुआ
अपनी ही लाश का खुद मज़ार आदमी

हर तरफ भागते दौड़ते रास्ते
हर तरफ आदमी का शिकार आदमी

रोज जीता हुआ रोज मरता हुआ
हर नए दिन नया इंतज़ार आदमी

ज़िन्दगी का मुक़द्दर सफ़र दर सफ़र
आखिरी सांस तक बेक़रार आदमी

 

-nida fazli

ख़ुदा

सामने है जो उसे लोग बुरा कहते हैं !
जिसको देखा ही नहीं उसको ख़ुदा कहते हैं !!

-sudarshan faakir

आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है ..

आज के दौर में ऐ दोस्त ये मंज़र क्यूँ है,
ज़ख़्म हर सर पे हर इक हाथ में पत्थर क्यूँ है !!

जब हक़ीक़त है के हर ज़र्रे में तू रहता है,
फिर ज़मीं पर कहीं मस्जिद कहीं मंदिर क्यूँ है !!

अपना अंजाम तो मालूम है सब को फिर भी,
अपनी नज़रों में हर इन्सान सिकंदर क्यूँ है !!

ज़िन्दगी जीने के क़ाबिल ही नहीं अब “फ़ाकिर”,
वर्ना हर आँख में अश्कों का समंदर क्यूँ है !!

 

-sudarshan faakir

मौला

फिर मूरत से बाहर आकर चारों ओर बिखर जा !

फिर मंदिर को कोई मीरा दिवानी दे मौला !!

 

-nida fazli